शाकंभरी से तेलपुर तक
एक गौरवशाली सफ़र
यह कथा स्मृति और संकल्प का संगम है—जहाँ हर विभाजन सिर्फ़ दूरी नहीं, बल्कि पहचान का नया आकार बनता है। स्क्रॉल करें: हर दृश्य एक निर्णायक मोड़।
महाराज सामन्तराज (684–709 ई.)
हमारे वंश के मुख्य स्तंभ महाराज सामन्तराज जी हैं। इन्हीं से हमारे भेदावत देवड़ा वंश की प्रमाणित और गौरवशाली वंशावली का आरंभ होता है।
यह वह समय था जब शाकंभरी की धरती पर चौहान साम्राज्य की नींव मजबूती से रखी जा रही थी।
सम्राट पृथ्वीराज चौहान III और हमारा वंश
जब चौहान साम्राज्य अपनी शक्ति के शिखर पर था, तब महाराज वाक्पतिराज प्रथम (917–944 ई.) के समय हमारे इतिहास ने एक नया मोड़ लिया:
सिरोही राजपरिवार बनाम हमारा परिवार
यह वह क्षण है जिसने हमारे परिवार की स्वतंत्र पहचान को गढ़ा। राव श्री रणमल (1374–1392 ई.), जिन्होंने पुराने सिरोही की स्थापना की थी, उनके बाद हमारे वंश की दो बड़ी धाराएं अलग हुईं:
और तेलपुर का उदय
राव गजासिंहजी की पीढ़ी में राव डूंगरजी हुए, जिनसे हमारे वंश ने अपनी विशिष्ट पहचान पाई:
राज सिंह और रावत सिंह की गाथा
तेलपुर की मिट्टी में जड़ें जमाने के बाद, भीमसिंहजी की पीढ़ी में हमारे परिवार की दो समांतर धाराएं बनीं: